कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहाँ गए वो मदमस्त दिन,
वो खुशियाँ,
वो खुशहाल बचपन,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर खून बिखरा पड़ा है,
बिखरी पड़ी है लाशें,
हर जगह आतंक का माहौल है,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर हर बच्चा-बच्चा डरा है,
डरी हुई है हर माँ,
आतंक से पीड़ित है हर जगह,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर आतंक से बेहाल है हर घर,
मिट गया है हर घर का चिराग,
खामोश है हर गलियां,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ!
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहाँ गए वो मदमस्त दिन,
वो खुशियाँ,
वो खुशहाल बचपन,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर खून बिखरा पड़ा है,
बिखरी पड़ी है लाशें,
हर जगह आतंक का माहौल है,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर हर बच्चा-बच्चा डरा है,
डरी हुई है हर माँ,
आतंक से पीड़ित है हर जगह,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ,
कहीं पर आतंक से बेहाल है हर घर,
मिट गया है हर घर का चिराग,
खामोश है हर गलियां,
कहने को तो मैं आजाद हूँ,
फिर भी दहशत के साए में जिया जा रहा हूँ!
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